देहाती संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेंगलुरु भाषण के विकास दावे वास्तविकता में कमजोर अवसंरचना, बाढ़ प्रबंधन की नाकामी, उच्च रक्षा आयात, गिरती शिक्षा गुणवत्ता, भारी कर और धीमी न्याय व्यवस्था के सामने फीके पड़ते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेंगलुरु में मेट्रो, वंदे भारत ट्रेनों और अन्य परियोजनाओं के उद्घाटन अवसर पर (10 AUG 2025) भारत की “तेज़ी से बढ़ती” अर्थव्यवस्था, अवसंरचना विस्तार, शिक्षा व स्वास्थ्य में सुधार, और ‘नए भारत’ की वैश्विक पहचान का चित्र खींचा। उन्होंने बताया कि 2014 के बाद मेट्रो नेटवर्क 5 शहरों से बढ़कर 24 शहरों में फैल गया, रेलवे विद्युतीकरण दोगुना हुआ, हवाई अड्डों की संख्या 74 से बढ़कर 160 हुई, राष्ट्रीय जलमार्ग 3 से 30 हो गए, और निर्यात 468 अरब डॉलर से 824 अरब डॉलर तक पहुँचा। स्वास्थ्य क्षेत्र में 7 से 22 AIIMS और 387 से 704 मेडिकल कॉलेज बढ़ने का दावा किया गया।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई इन आँकड़ों से मेल नहीं खाती। भारत की बुनियादी अवसंरचना आज भी विकसित देशों से कोसों दूर है—ग्रामीण इलाकों में सड़क, पुल, स्वच्छ पेयजल, और बिजली आपूर्ति की कमी आम है। शहरी क्षेत्रों में ट्रैफिक जाम, गड्ढायुक्त सड़कें और सार्वजनिक परिवहन की अव्यवस्था नागरिक जीवन की गुणवत्ता घटा रही हैं।
बाढ़ प्रबंधन में अक्षमता हर साल करोड़ों लोगों को विस्थापित करती है, जबकि नदियों के किनारे बसे राज्यों में राहत कार्य धीमा और अपर्याप्त है। जल निकासी और शहरी नियोजन की खामियां बड़े शहरों में जलभराव की स्थायी समस्या बन चुकी हैं।
‘मेक इन इंडिया’ के बावजूद भारत दुनिया के शीर्ष रक्षा आयातक देशों में है, जिससे सामरिक आत्मनिर्भरता पर सवाल उठते हैं। उच्च शिक्षा संस्थान लगातार वैश्विक रैंकिंग में गिर रहे हैं—IIT, IIM और विश्वविद्यालय शोध गुणवत्ता, फंडिंग और अकादमिक स्वतंत्रता में पिछड़ रहे हैं।
कराधान व्यवस्था में जीएसटी व प्रत्यक्ष करों का बोझ छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग पर भारी है। बेरोजगारी दर, विशेषकर युवाओं में, चिंताजनक रूप से ऊँची बनी हुई है। सरकारी भाषणों में रोजगार सृजन की बातें होती हैं, लेकिन असंगठित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति इसके विपरीत है।
गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले करोड़ों लोग आज भी राशन दुकानों पर लंबी कतारों में खड़े रहते हैं—यह दर्शाता है कि खाद्य सुरक्षा और जनकल्याण योजनाएं अभी भी लक्ष्य से दूर हैं। स्वास्थ्य सेवा में निजी अस्पतालों की लागत गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को कर्ज के जाल में धकेल देती है, जबकि सरकारी अस्पताल संसाधन और कर्मियों की कमी से जूझ रहे हैं।
न्यायपालिका की हालत भी दयनीय है—3.5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, निचली अदालतों में जजों की भारी कमी है, और न्याय पाने में वर्षों लग जाते हैं। पुलिस सुधार, कानूनी ढांचे का आधुनिकीकरण, और अदालतों का डिजिटलीकरण धीमी गति से हो रहा है।
ये सारे तथ्य बताते हैं कि सरकारी आँकड़े और भाषण अक्सर कागज़ी उपलब्धियों का महिमामंडन करते हैं, जबकि आम नागरिक की ज़िंदगी में इनका ठोस असर सीमित है। वास्तविक प्रगति के लिए केवल परियोजनाओं के उद्घाटन या निर्यात वृद्धि पर्याप्त नहीं—इसके लिए टिकाऊ बुनियादी ढांचा, प्रभावी आपदा प्रबंधन, शिक्षा-स्वास्थ्य सुधार, कर में संतुलन, रोजगार सृजन, और न्याय व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव अनिवार्य हैं। भारत की विकास यात्रा तभी वास्तविक होगी जब यह हर नागरिक के जीवन स्तर में समान रूप से परिलक्षित हो।
August 11, 2025
