संपादकीय
मोदी सरकार का स्वदेशी आंदोलन क्यों नहीं पकड़ पा रहा रफ्तार? भारत आज भी चीन से गणेश मूर्ति और राखी आयात करता है, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल की औद्योगिक असफलता बनी बड़ी बाधा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से जब देशवासियों से स्वदेशी खरीदो और वोकल फॉर लोकल का आवाहन किया, तब उन्होंने आत्मनिर्भर भारत की एक नई चेतना की बात की। पर सवाल यह उठता है कि क्या इस चेतना को ज़मीन पर वह आधार मिल पाया है जिसकी आवश्यकता एक सशक्त स्वदेशी आंदोलन को होती है? क्या मोदी सरकार ने पिछले दस वर्षों में भारत को विनिर्माण क्षेत्र में इतना सक्षम बनाया है कि आम नागरिक बिना झिझक “केवल स्वदेशी” का चुनाव कर सके?
सच्चाई यह है कि मोदी जी का यह स्वदेशी अभियान उस बुनियादी अधूरी तैयारी का शिकार है, जिसे सरकार ने जानबूझकर नजरअंदाज किया है। ‘मेक इन इंडिया’ के गगनभेदी नारे के बाद भी भारत का विनिर्माण क्षेत्र 2014 से अब तक स्थायी रूप से जड़ें नहीं जमा पाया। देश की जीडीपी में विनिर्माण का हिस्सा लगभग वही 15-17% पर अटका हुआ है, जहाँ वह एक दशक पहले था।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि “हम वही खरीदेंगे जिसमें किसी भारतीय का पसीना बहा हो”, लेकिन क्या देश की सच्चाई इस आदर्श से मेल खाती है? त्योहारी मौसम में जब बाज़ारों में रौनक होती है, तो गणेश चतुर्थी पर चीन से आयातित गणेश मूर्तियाँ बिकती हैं, रक्षाबंधन पर चीनी राखियाँ थोक में भारत आते हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस देश में करोड़ों मूर्तिकार, दस्तकार और कारीगर हैं, वहां के घरों में पूजे जाने वाले देवता भी चीन से आयात होकर आते हैं?
मोदी सरकार बार-बार उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों को विकास की नयी धुरी बताती रही है, लेकिन सच यह है कि ये राज्य आज भी औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं। उत्तर प्रदेश में ब्रह्मोस मिसाइल का कारखाना खोलना प्रतीकात्मक महत्व तो रखता है, लेकिन राज्य में व्यापक औद्योगिक बुनियाद और रोजगार देने वाले लघु एवं मध्यम उद्योगों की कमी अब भी बनी हुई है। बिहार में उद्योग का मतलब आज भी बांकीपुर स्टेशन के आस-पास की कुछ इकाइयाँ भर है, और पश्चिम बंगाल में तो टाटा की नैनो परियोजना के जाने के बाद कोई बड़ा विनिर्माण निवेश शायद ही हुआ हो।
मोदी सरकार ने एक दशक में ‘Ease of Doing Business’ और ‘Startup India’ जैसी योजनाओं के माध्यम से नीतिगत सुधार की बात ज़रूर की, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि आज भी बिजली, भूमि, श्रम और निवेश सुरक्षा जैसे बुनियादी अवरोधों ने विनिर्माण उद्योग को आगे बढ़ने नहीं दिया। कोरोना काल के बाद जब पूरी दुनिया चीन प्लस वन रणनीति के तहत भारत को विकल्प मान रही थी, तब भी वियतनाम, बांग्लादेश और इंडोनेशिया ने भारत से बेहतर प्रदर्शन किया।
स्वदेशी की बात तब तक खोखली ही रहेगी जब तक भारत अपने युवाओं को नौकरी देने वाला उद्योग नहीं खड़ा करता। वोकल फॉर लोकल का मंत्र ग्राहकों के नहीं, निर्माताओं के आत्मबल से सशक्त होता है। दुर्भाग्यवश भारत अभी तक ऐसा आत्मबल विकसित नहीं कर पाया है।
यह विचारणीय है कि जब प्रधानमंत्री काशी से यह कहते हैं कि “हम अब विदेशों में शादी करने के बजाय देश में करेंगे”, तो यह केवल भावनात्मक अपील लगती है। देश में शादी हो या खरीदारी, अगर विकल्प ही विदेशी हो — तकनीक से लेकर सजावटी सामान तक — तो स्वदेशी कैसे टिकेगा?
मोदी जी की अपील राष्ट्रवाद के नाम पर बाज़ार को मोड़ने की रणनीति है, लेकिन बाज़ार राष्ट्रभक्ति नहीं, व्यवहारिकता से चलता है। जब तक घरेलू उत्पाद सस्ते, गुणवत्तापूर्ण और उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक उपभोक्ता चीन, मलेशिया और बांग्लादेश के उत्पाद ही खरीदेगा।
देश को स्वदेशी की ओर ले जाना है तो नारे नहीं, नीतियाँ चाहिए। भाषण नहीं, उत्पादन चाहिए।
आज भारत को ज़रूरत है:
- सुनियोजित औद्योगिक नीति की, जो केवल पूंजीपतियों के अनुकूल न हो, बल्कि छोटे और मंझोले उद्योगों को भी ताकत दे।
- राज्यों में औद्योगिक विकेन्द्रीकरण की, ताकि उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल जैसे राज्यों में भी काम करने लायक फैक्ट्रियाँ लग सकें।
- तकनीकी नवाचार और श्रमिक कौशल विकास की, जिससे भारतीय उत्पाद वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकें।
विकास की राजनीति अगर सच्चे स्वदेशी आंदोलन का आधार बनती तो आज प्रधानमंत्री को यह नहीं कहना पड़ता कि “हम अब घर भी स्वदेशी से सजाएंगे”, क्योंकि तब हर घर पहले से ही भारतीय उत्पादों से सज रहा होता।
जब तक भारत “स्वदेशी” की आत्मा को उद्योग नीति और श्रमिक-निवेश संरचना में नहीं उतारता, तब तक स्वदेशी केवल एक चुनावी नारा रहेगा — और चीन से गणेशजी आते रहेंगे।
August 3, 2025
