भारत विभाजन: विश्वासघात और रक्तपात की दास्तान

भारत विभाजन: विश्वासघात और रक्तपात की दास्तान

कांग्रेस और माउंटबैटन—स्वाधीनता के नाम पर तीन अपराधी

भारत का विभाजन कोई अनिवार्य नियति नहीं था, यह कोई ईश्वरीय विधान नहीं था और न ही यह इतिहास की कोई अपरिहार्य घटना थी। यह एक अपराध था, और अपराधों के अपराधी होते हैं। इस अपराध के भी तीन अपराधी हैं—जिन्ना, कांग्रेस और माउंटबैटन। अब समय आ गया है कि इन अपराधियों का नाम स्पष्ट शब्दों में लिया जाए।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा तैयार एक नये विशेष मॉड्यूल में भारत विभाजन के लिए तीन प्रमुख व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहराया गया है—मुहम्मद अली जिन्ना, कांग्रेस नेतृत्व और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन। यह मॉड्यूल ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ (हर वर्ष 14 अगस्त को मनाया जाने वाला) के लिए बनाया गया है। इसमें स्पष्ट कहा गया है—“पहले, जिन्ना जिन्होंने इसकी माँग की; दूसरे, कांग्रेस जिसने इसे स्वीकार किया; और तीसरे, माउंटबेटन जिन्होंने इसे लागू किया।”

पहला अपराधी—मुहम्मद अली जिन्ना। एक वकील जिसने राजनीति को सांप्रदायिक ज़हर में बदल दिया। उसने मुसलमानों को समझाया कि वे पीड़ित हैं, कि साथ रहना अपमान है, और अलग होना ही मुक्ति है। 1940 के लाहौर अधिवेशन में उसने कहा: “हिन्दू और मुसलमान दो अलग धार्मिक दार्शनिकताएँ हैं… उनके नायक अलग हैं, उनके महाकाव्य अलग हैं… एक का नायक दूसरे का खलनायक है।” यह कोई राजनीतिक दलील नहीं थी, यह तो भारत की आत्मा के विरुद्ध घोषणा थी। 1946 में ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम पर उसने हिंसा को राजनीति का औज़ार बना दिया। कलकत्ता की गलियाँ तीन दिन तक लाशों से पट गईं। जिन्ना ने पाकिस्तान कोई मातृभूमि के रूप में नहीं माँगा, उसने उसे हिंसा के बल पर वसूला। और जब पाकिस्तान बन गया तो उसने स्वीकार किया: “मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह होगा। मैंने सोचा भी नहीं था कि अपने जीवनकाल में पाकिस्तान देखूँगा।” करोड़ों लोग मारे गए ताकि एक महत्वाकांक्षी नेता अपनी जिद पूरी कर सके।

दूसरा अपराधी—भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस। यह वही दल था जिसने स्वतंत्रता की ठेकेदारी ली, लेकिन निर्णायक क्षण पर काँप गया, झुक गया और भारत की एकता को सौदे में बेच दिया। सरदार पटेल ने कहा: “मैं विभाजन के पक्ष में नहीं हूँ। पर इसे कड़वी दवा की तरह स्वीकार करना पड़ेगा।” नेहरू बोले: “विभाजन बुरा है। लेकिन गृहयुद्ध उससे भी अधिक बुरा होगा।” गांधीजी ने प्रार्थना सभा में कहा: “अगर कांग्रेस विभाजन स्वीकार करती है तो यह मेरी सलाह के विरुद्ध होगा, पर मैं इसका हिंसा या क्रोध से विरोध नहीं करूँगा।” यह नेतृत्व नहीं था—यह आत्मसमर्पण था। कांग्रेस ने जिन्ना की हिंसा से भयभीत होकर विभाजन मान लिया और इस तरह साम्प्रदायिक ब्लैकमेल को वैधता दे दी। पंजाब और बंगाल को उन्होंने नीलाम कर दिया, करोड़ों निर्दोषों को कत्लेआम के हवाले कर दिया, और हिमालय की गोद में स्थायी युद्ध की चिंगारी बो दी।

तीसरा अपराधी—लॉर्ड लुई माउंटबैटन। यह साम्राज्य का अंतिम मुहर्रिर था, जिसने घड़ी देख कर भारत को टुकड़े-टुकड़े किया। 1948 जून तक का समय होने पर भी उसने जल्दबाज़ी में अगस्त 1947 की तारीख थोप दी। सर सायरिल रेडक्लिफ को केवल पाँच हफ़्ते दिए गए कि वे नक्शे पर लकीर खींचकर तय करें कि कौन-सा गाँव भारत में रहेगा और कौन-सा पाकिस्तान में। रेडक्लिफ ने बाद में कहा: “मुझे काम दिया गया था, मैंने अपनी ओर से सर्वोत्तम किया, चाहे अच्छा न भी हुआ हो।” अच्छा न भी हुआ हो? लाखों लाशें, जली हुई बस्तियाँ, औरतों की अस्मिता का रक्त—क्या यह केवल “अच्छा न हुआ” था? माउंटबैटन ने बाद में अपने हाथ झाड़ लिए: “मैंने भारत का विभाजन नहीं किया। यह भारतीय नेताओं ने स्वीकार किया। मैंने तो केवल कार्यान्वित किया।” जिसने बारूद सुलगाई, वही निर्दोष होने का ढोंग करता रहा।

इस प्रकार तीनों अपराधी स्पष्ट हैं। जिन्ना—जिसने माँगा। कांग्रेस—जिसने झुक कर मान लिया। माउंटबैटन—जिसने इसे अव्यवस्थित और रक्तरंजित बना दिया। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी, यह एक योजनाबद्ध त्रासदी थी।

परिणाम सबके सामने है। पाकिस्तान—एक ऐसा राष्ट्र जो शिकायत और हिंसा की कोख से पैदा हुआ। भारत—दोनों ओर शत्रुतापूर्ण सीमाओं से घिरा, कश्मीर की आग में झुलसता हुआ, पंजाब और बंगाल की समृद्धि से वंचित। लॉर्ड वेवेल ने 1946 में चेताया था: “विभाजन साम्प्रदायिक समस्या को सुलझाएगा नहीं, बल्कि स्थायी बना देगा। यह कड़वाहट को और बढ़ाएगा।” और वही हुआ।

श्री अरविन्द ने स्वतंत्रता की रात कहा था: “विभाजन जाना चाहिए। यह स्थायी नहीं रहना चाहिए। यदि यह टिक गया तो भारत कमजोर और पंगु हो जाएगा।” उनका शाप आज भी सच साबित हो रहा है।

इस विभाजन का दोष केवल तीन पर है—जिन्ना जिसने माँगा, कांग्रेस जिसने स्वीकार किया, और माउंटबैटन जिसने जल्दबाज़ी से इसे अंजाम दिया। तीनों ने मिलकर भारत को चीर डाला, लाखों निर्दोषों को मौत और निर्वासन दिया, और आज तक हमें उसकी सज़ा भुगतनी पड़ रही है।

इतिहास आखिरकार सफ़ेद झूठों को उतार रहा है। एनसीईआरटी (NCERT) ने नाम लेकर कहा—जिन्ना, कांग्रेस और माउंटबैटन ही विभाजन के दोषी थे। सत्य कड़वा है, पर अब सामने है। भारत का विभाजन नियति नहीं, विश्वासघात था।

August 17, 2025


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