स्वतंत्रता दिवस पर आरएसएस की प्रशंसा ने छेड़ा धर्मनिरपेक्षता बनाम वैचारिक राजनीति का विवाद
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 79वां स्वतंत्रता दिवस भाषण इस बार एक अलग ही संदेश लेकर आया, जब उन्होंने खुले तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का नाम लिया और उसके सौ वर्षों की यात्रा को निःसंकोच श्रद्धांजलि अर्पित की। दृढ़ स्वर में उन्होंने कहा कि देश केवल सरकारों या सत्ता में बैठे लोगों के हाथों से नहीं बनता, बल्कि साधु-संतों, वैज्ञानिकों, सैनिकों, किसानों, श्रमिकों और विभिन्न संस्थानों के सामूहिक प्रयास से निर्मित होता है।
इसी भावना से उन्होंने 1925 में स्थापित आरएसएस को दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन बताते हुए कहा कि सेवा, समर्पण, संगठन और अनुशासन के सिद्धांतों के साथ यह संगठन सौ वर्षों से मां भारती के कल्याण में समर्पित है। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने हर स्वयंसेवक को नमन किया, जिसने चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की इस शताब्दी यात्रा में योगदान दिया, और इसे देश का स्वर्णिम अध्याय बताया।
राजनीतिक प्रतिक्रिया तुरंत सामने आई। गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री की सराहना को आगे बढ़ाते हुए संघ की व्यक्तिगत और राष्ट्रीय विकास में भूमिका को रेखांकित किया, वहीं विपक्ष ने कड़ा रुख अपनाया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इतने प्रतीकात्मक मंच से आरएसएस का नाम लेना धर्मनिरपेक्ष भावना के विपरीत है और यदि इसका उल्लेख करना था तो इसे स्वतंत्रता संग्राम में संगठन की भूमिका के संदर्भ में किया जाना चाहिए था—जिसे आलोचक बेहद सीमित मानते हैं। आरएसएस की ऐतिहासिक और वैचारिक पृष्ठभूमि हमेशा से राजनीतिक बहस का केंद्र रही है।
नागपुर में स्थापित इस संगठन का उद्देश्य हिन्दू समाज को सनातन धर्म की सभ्यतागत अवधारणा के अंतर्गत एकजुट करना, हिन्दू अनुशासन विकसित करना और वेद-ब्राह्मणों में निहित सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना था—एक ऐसी बौद्धिक परंपरा जो कैथोलिक चर्च से भी सहस्राब्दियों पुरानी है और जिसमें कोई केंद्रीकृत पुजारी तंत्र नहीं है। दशकों से आरएसएस को भाजपा की वैचारिक धारा का स्रोत माना जाता रहा है, हालांकि संघ के सामाजिक कार्य और भाजपा की चुनावी रणनीति के बीच समय-समय पर मतभेद भी रहे हैं।
मोडी का यह कदम राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। हाल ही के चुनाव में भाजपा ने संसद में बहुमत खो दिया और नीतिश कुमार व चंद्रबाबू नायडू के साथ गठबंधन करना पड़ा। अंतरराष्ट्रीय टैरिफ दबाव के बीच लंबे समय से उपेक्षित स्वदेशी विनिर्माण को गति देना और संघ परिवार की राजनीतिक-सामाजिक शाखाओं को पुनः एकजुट करना सरकार के सामने बड़ी चुनौती है। ऐसे समय में राष्ट्र के सबसे दृश्यमान और प्रतीकात्मक मंच से आरएसएस को सम्मान देना प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत विश्वास का भी प्रदर्शन है और भाजपा के राजनीतिक व सामाजिक आधार को सुदृढ़ करने की रणनीति भी।
कांग्रेस-नेतृत्व वाले ‘इंडि’ गठबंधन के लिए यह भारत की पहचान को लेकर वैचारिक संघर्ष में एक नया उकसावा है; वहीं मोदी और उनके समर्थकों के लिए यह प्रमाण है कि भारत सरकार आरएसएस के योगदान को मान्यता और सम्मान देती है। आलोचकों के दृष्टिकोण से, यह राज्य और एक विशेष सांस्कृतिक-धार्मिक आधार वाले सामाजिक आंदोलन के बीच की रेखा को धुंधला करने का संकेत है।
किसी भी दृष्टि से देखें, स्वतंत्रता दिवस के इस भाषण की राजनीतिक गूंज लालकिले की दीवारों से बहुत दूर तक जाने वाली है।
15 अगस्त, 2025
