SUPREME COURT OF INDIA
झारखंड राज्य एवं अन्य बनाम विकास तिवारी @ बिकाश तिवारी @ बिकाश नाथ
(क्रिमिनल अपील संख्या 240/2025)
दिनांक: 17 जनवरी 2025
[न्यायाधीश: जे.बी. पारडीवाला और आर. महादेवन]
1. परिचय
यह मामला झारखंड राज्य के कारा महानिरीक्षक द्वारा दिनांक 17.05.2023 को जारी आदेश/मेमो को रद्द करने के उच्च न्यायालय के निर्णय की वैधता से संबंधित है। उक्त आदेश के तहत, प्रतिवादी को लोक नायक जयप्रकाश नारायण केंद्रीय कारागार, हजारीबाग से केंद्रीय कारागार, दुमका में स्थानांतरित किया गया था।
2. विचारणीय मुद्दा
क्या उच्च न्यायालय द्वारा 17.05.2023 के स्थानांतरण आदेश को रद्द करना उचित था?
3. प्रासंगिक विधिक प्रावधान
- कैदी अधिनियम, 1900 (Prisoners Act, 1900) – धारा 29
- राज्य जेल नियमावली, 1925 – नियम 770(ख)
- भारतीय दंड संहिता, 1860 – धारा 302, 120-बी, 34, 353/34, 341/34
- आर्म्स एक्ट, 1959 – धारा 25(1-ए), 26/35, 27(2)
- विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 – धारा 3, 4, 5
- मॉडल जेल एवं सुधारात्मक सेवा अधिनियम, 2023 – नियम 35
- संविधान का अनुच्छेद 21 – कैदियों के मौलिक अधिकार
4. न्यायालय का निर्णय
(क) स्थानांतरण आदेश की वैधता
- जेल अधीक्षक ने 16.05.2023 को पत्र भेजकर जेल में दो कुख्यात अपराधियों की उपस्थिति के कारण गिरोह संघर्ष (गैंग वॉर) की संभावना जताई थी।
- कारागार प्रशासन ने इस स्थिति से निपटने के लिए अपर्याप्त सुरक्षा बल (कचपालों) का हवाला दिया।
- इस खतरे को देखते हुए, कारा महानिरीक्षक ने धारा 29 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग कर कैदी को एक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने का निर्णय लिया।
- यह कदम जेल की सुरक्षा बनाए रखने और संभावित गिरोह हिंसा को रोकने के लिए उठाया गया था।
- न्यायालय ने माना कि यह निर्णय न केवल कानूनी था बल्कि आवश्यक भी था।
(ख) उच्च न्यायालय का निर्णय त्रुटिपूर्ण क्यों था?
- जेल प्रशासन को कैदियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है।
- जेल प्रशासन का यह दायित्व होता है कि वह जेल के भीतर अनुशासन बनाए रखे और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए।
- उच्च न्यायालय द्वारा इस आदेश को रद्द करने से जेल प्रशासन की सुरक्षा नीति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था।
- सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय का निर्णय गलत ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया और 17.05.2023 का स्थानांतरण आदेश बहाल कर दिया।
5. कैदियों के अधिकार एवं सुधारात्मक दृष्टिकोण
- अनुच्छेद 21 के तहत कैदियों के अधिकार
- कैदियों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है, हालांकि वे स्वतंत्रता से वंचित होते हैं।
- जेल प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि कैदियों को बुनियादी सुविधाएं दी जाएं और उनके साथ अमानवीय व्यवहार न किया जाए।
- जेल के भीतर कठोर अनुशासन और सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन इसे इस हद तक लागू नहीं किया जाना चाहिए कि यह कैदियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे।
- जेल सुधार और पुनर्वास का महत्व
- जेलों को केवल दंड के स्थान के रूप में नहीं, बल्कि सुधार गृह के रूप में देखा जाना चाहिए।
- सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जेलों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों और वहां सुधारात्मक कार्यक्रम लागू किए जाएं।
- कैदियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की देखभाल आवश्यक है।
6. दिशा-निर्देश और निष्कर्ष
- झारखंड राज्य को निर्देश दिया गया कि वह मॉडल जेल मैनुअल, 2016 को अपनाने की प्रक्रिया को तेज करे और इसका पालन सुनिश्चित करे।
- जेल प्रशासन को सुनिश्चित करना चाहिए कि कैदियों के अधिकारों की रक्षा हो, लेकिन जेल की सुरक्षा और व्यवस्था भी प्राथमिकता में रहे।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्थानांतरण आदेश न केवल न्यायसंगत था बल्कि कैदी की सुरक्षा और जेल प्रशासन की प्रभावशीलता के लिए आवश्यक था।
न्यायालय का अंतिम निर्णय
- उच्च न्यायालय का आदेश रद्द किया गया।
- 17.05.2023 का स्थानांतरण आदेश पुनः प्रभावी कर दिया गया।
केस कानून का हवाला
महाराष्ट्र राज्य और अन्य बनाम सईद सोहेल शेख और अन्य [2012] 11 एससीआर 916: (2012) 13 एससीसी 192; कल्याण चंद्र सरकार बनाम राजेश रंजन (2005) 3 एससीसी 284; सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन और अन्य [1979] 1 एससीआर 392: (1978) 4 एससीसी 494; कल्याण चंद्र सरकार बनाम राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (2005) 3 एससीसी 284; महाराष्ट्र राज्य बनाम सैय्यद नूर हसन गुलाम हुसैन, 1995 Crl.LJ 765 SC; राम मूर्ति बनाम कर्नाटक राज्य (1997) 2 एससीसी 642; 1382 जेलों में अमानवीय स्थितियाँ, [2017] 14 एससीआर 519: (2017) 10 एससीसी 658 के संबंध में – संदर्भित।
[2025] 2 S.C.R. 63 : 2025 INSC 79
