Bajirao Peshwa (18 August 1700 – 28 April 1740)
बाजीरावका लक्ष्य: अखंड हिंदू साम्राज्य की स्थापना
कालचक्र के दुर्निवार परिवर्तन के प्रभाव से जो देश आज दुर्भिक्ष और महामारी का क्रीड़ाक्षेत्र बन गया है, जिस देश की छठी अंश जनसंख्या को समृद्ध वर्षों में भी आधे पेट रहकर जीवन व्यतीत करना पड़ता है, वही देश एक समय में सौभाग्य एवं समृद्धि का केंद्र माना जाता था। “अनंत-रत्न प्रसविनी” कहने पर तत्कालीन विश्व में केवल भारतभूमि ही अभिप्रेत थी। हमारी यह जन्मभूमि कभी पूर्णतः “रत्नगर्भा वसुंधरा” की संज्ञा को चरितार्थ करती थी। किन्तु, शुक-पक्षी के मधुर स्वर के समान भारतभूमि की यह संपन्नता दुर्भाग्यवश उसकी पराधीनता का प्रमुख कारण बन गई।
प्राचीन काल से ही पारसी, यूनानी, शक, हूण, पठान, मुग़ल आदि विभिन्न विदेशी जातियां भारत की अपार धन-सम्पदा के लालच को रोक पाने में असमर्थ रहकर समय-समय पर इस देश पर आक्रमण करती रहीं। इन आक्रमणों में महमूद ग़ज़नवी का अभियान विशेष रूप से प्रसिद्ध है। ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में यह वीर धनलिप्सा से प्रेरित एवं धार्मिक उन्माद में उन्मत्त होकर सत्रह बार भारत पर आक्रमण कर इसे हिंदु संतानों के रक्त से अभिषिक्त कर दिया तथा इसकी अपार संपदा को लूट लिया। इसी के प्रयासों से भारत पर मुस्लिम विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके पश्चात् लगभग सात सौ वर्षों तक यह देश मुस्लिम आक्रांताओं के आघात से मुक्त नहीं हो सका।
ग़ज़नवी वंश के पतन के पश्चात घोरवंशीय शहाबुद्दीन ने विभिन्न देशों से युद्ध-कुशल सैनिकों को संगठित कर भारत विजय की योजना बनाई। उसके निर्देश पर 1193 ईस्वी में एक लाख बीस हज़ार अश्वारोही सैनिकों सहित धर्मान्ध, प्रचंड उत्साही अफगान योद्धा समुद्र-लहरों के समान भारत पर टूट पड़े। इस समय के हिंदू योद्धा शौर्य एवं युद्धकौशल में इन नवागंतुक मुस्लिम आक्रांताओं से किसी प्रकार हीन न थे; किन्तु, वे अफगान जाति के जन्मजात उग्र स्वभाव, नवीन ऊर्जा, धार्मिक उत्साह और साम्राज्य-विस्तार की प्रबल आकांक्षा से विहीन थे। वे केवल आत्मरक्षा की नीति के अंतर्गत ही युद्ध में प्रवृत्त हुए, जबकि मुस्लिम आक्रांताओं की विजय-लालसा उन्हें संघर्ष में निरंतर धैर्यवान बनाती रही।
फिर भी, प्राचीन हिंदू योद्धाओं से संग्राम में यह नवोदित जाति अनेक बार पराजित हुई। कोई भी हिंदू राज्य सहजता से उनके अधिकार में नहीं आया। कई अवसरों पर उन्हें अधर्ममय युद्धनीति अपनाकर विजय प्राप्त करनी पड़ी। शहाबुद्दीन ने कूटनीति एवं निरंतर तीस वर्षों के प्रयास से आर्यावर्त के अधिकांश खंड-राज्यों में अपनी अर्धचंद्राकृत विजयपताका फहराई। तेरहवीं शताब्दी के अंत तक मुस्लिम सत्ता आर्यावर्त तक ही सीमित थी, परंतु शीघ्र ही उनकी दृष्टि दक्षिण भारत पर केंद्रित हुई।
मुस्लिम आक्रांताओं में सर्वप्रथम ख़िलजी वंशीय अलाउद्दीन ने छलनीति द्वारा सरल स्वभाव महाराष्ट्रीय शासकों के राज्य में प्रवेश की अनुमति प्राप्त की। दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ होते ही यवन सेना महाराष्ट्रीय स्वतंत्रता को समाप्त करने के लिए दक्षिण भारत की ओर अग्रसर हुई। तत्कालीन महाराष्ट्रपति रामचंद्र राव और उनके जमाता हरपाल देव ने बीस वर्षों तक स्वराज्य की रक्षा के लिए संघर्ष किया। यद्यपि वे सफल न हो सके, फिर भी महाराष्ट्रीय सामंतगण ने लंबे समय तक अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिरोध किया।
किन्तु, मुस्लिम सत्ता की बढ़ती हुई शक्ति का प्रतिरोध करना क्रमशः असंभव होता गया। मुस्लिम आक्रांताओं (Muslim invaders) ने अद्वितीय धैर्य एवं अपराजेय साम्राज्य-विस्तार की आकांक्षा से संपूर्ण दक्षिण भारत को बारंबार लूटकर ध्वस्त कर दिया। इतिहासकार फ़रिश्ता के अनुसार, 1310 ईस्वी में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने कर्नाटक (Karnataka) प्रांत को लूटकर तीन सौ हाथी, बीस हजार घोड़े और छियानबे हजार मन स्वर्ण प्राप्त किया। इस आक्रमण के कारण कर्नाटक प्रदेश से समस्त संपत्ति समाप्त हो गई।
इस प्रकार निरंतर आक्रमणों की शृंखला के परिणामस्वरूप 1347 ईस्वी में “बहमनी” राज्य की स्थापना हुई। यह राजवंश 175 वर्षों तक महाराष्ट्र क्षेत्र पर शासन करता रहा। परंतु, सरदारों के पारस्परिक विवाद और विद्रोह के कारण यह राज्य पाँच भागों में विभाजित हो गया। इन राज्यों के सुल्तानों ने लगभग एक शताब्दी तक तीव्र शक्ति से दक्षिण भारत पर शासन किया।
मुस्लिम शासकों की ढाई शताब्दी लंबी कठोर सत्ता-शृंखला से पीड़ित महाराष्ट्र-निवासी अत्याचार से त्रस्त हो “त्राहि-त्राहि” करने लगे। महाराष्ट्र में आर्य धर्म और आर्य विद्या लगभग विलुप्तप्राय हो गई थी। अधिकांश प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में देवमंदिरों के स्थान पर मस्जिदें निर्मित कर दी गईं। हिंदुस्थान यवन-राज्य में परिवर्तित होता देखकर धर्मप्राण महाराष्ट्र-वासियों में भय उत्पन्न हुआ। दाक्षिणात्य कवि अपने सुखमय कल्पना-साम्राज्य को त्यागकर देश की दुर्दशा के वर्णन में संलग्न हो गए।
ऐसे दारुण समय में, जब संपूर्ण देश में यवन सैनिकों का अत्याचार व्याप्त था, अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में एक असाधारण महापुरुष का जन्म हुआ। इस महापुरुष ने महाराष्ट्र में जन्म लेकर अपनी विलक्षण शक्ति से सम्पूर्ण महाराष्ट्र को एकत्र किया और भारतभूमि को विदेशी शासन के चंगुल से मुक्त करने का संकल्प लिया। वे थे बाजीराव। उनका जीवन लक्ष्य भारत में अखंड हिंदू साम्राज्य की स्थापना और लुप्तप्राय हिंदू धर्म की पुनः प्रतिष्ठा था।
बाजीराव ने जिस नीति का अनुसरण किया, वह छत्रपति शिवाजी द्वारा प्रतिपादित थी। शिवाजी के पश्चात महाराष्ट्र के वीरों ने इस नीति का पालन कर दक्षिण में अपनी सत्ता को सुदृढ़ किया। किन्तु, बाजीराव की नीति के प्रभाव से यह नीति संपूर्ण भारत में क्रियान्वित हुई और इसका परिणाम यह हुआ कि भारत के अधिकांश प्रदेश मुस्लिम शासन के बंधन से मुक्त होकर महाराष्ट्र की छत्रछाया में आ गए।
बाजीराव के पश्चात लगभग एक शताब्दी बाद अंग्रेजों ने इस नीति का परिवर्धन कर इसे “सब्सिडियरी एलायंस” के रूप में अपनाया, जिसके आधार पर उन्होंने सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन कर लिया। अंग्रेजी इतिहास में यह नीति “सब्सिडियरी सिस्टम” के नाम से प्रसिद्ध हुई।
अतः यह स्पष्ट होता है कि जिस चतुर राजनीति और निर्भीक सैन्य शक्ति से बाजीराव ने भारत में हिंदू राज्य (Hindu State) की पुनः स्थापना की, वह अद्वितीय थी।
Date: 21/2/2025
