बंगाली मस्तिष्क और उसका दुरुपयोग: आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रॉय
आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रॉय (1861-1944)
लेख और भाषण
द्वितीय साहित्य सम्मेलन के अभिभाषण में मैंने एक स्थान पर कहा था— “लगभग एक सहस्र वर्षों से हिंदू जाति मृतप्राय-सी बनी हुई है। जिस प्रकार किसी धनिक के संतान पितृसंपत्ति को खोकर निर्धनता में जीवन व्यतीत करते हैं, परंतु अपने पूर्वजों की संपदा का हवाला देकर गर्वोन्मत्त बने रहते हैं, हमारी स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। इतिहासकार लीकी का कथन है कि ईसवी सन् की बारहवीं शताब्दी से यूरोप में स्वतंत्र चिंतन की धारा प्रवाहित होनी आरंभ हुई, और लगभग उसी समय भारत पर अंधकार का आवरण छा गया। प्रोफेसर वेबर का यह कथन अत्यंत यथार्थ है कि भास्कराचार्य भारतीय आकाश के अंतिम ज्योति-पुंज थे।
निस्संदेह, हम लोग नूतन स्मृति तथा नूतन न्याय का उदाहरण देकर बंगाली बुद्धि की प्रखरता पर गर्व करते हैं, किंतु यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जब स्मार्त भट्टाचार्यगण मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर आदि के शास्त्रों का अध्ययन कर यह विचार कर रहे थे कि यदि नववर्षीय विधवा निःजल उपवास न करे तो उसके पितृकुल और मातृकुल के कितने पीढ़ियों के पूर्वज नरकगामी होंगे, जब रघुनाथ, गदाधर और जगदीश जैसे महा-महोपाध्याय जटिल टीकाएँ लिखकर टोल के छात्रों में भय उत्पन्न कर रहे थे, जब यहाँ के ज्योतिषीगण यह निर्णय कर रहे थे कि यदि किसी दिन प्रातःकाल दक्षिण-पश्चिम दिशा में कौवा कांव-कांव कर उठे, तो वह दिन किस प्रकार व्यतीत होगा, और इसी आधार पर ‘काकचरित्र’ नामक ग्रंथों की रचना कर रहे थे, जब हमारे पंडितगण ‘ताल गिरकर धिप् करता है, अथवा धिप् कर गिरता है’— इस प्रकार की तर्क-संगति पर शास्त्रार्थ कर जनता को व्यथित कर रहे थे, उसी समय यूरोप में गैलीलियो, केप्लर और न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक उदीयमान थे, जो प्रकृति के नवीनतम रहस्यों का उद्घाटन कर ज्ञान-जगत में युगांतर उपस्थित कर रहे थे और मानव-जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर रहे थे।
उक्त टिप्पणी पर गहराई से विचार करना आवश्यक है। विशेष रूप से, बंकिमचंद्र ने एक स्थान पर उल्लेखनीय बंगाली महापुरुषों के साथ कुल्लूक भट्ट का नाम लेकर कहा है— ‘अपने अवनत अवस्था में भी बंगमाता रत्नगर्भा बनी रही।’ अब विचारणीय यह है कि इस आधुनिक संघर्षमय युग में अपने राष्ट्रीय अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए हमें रघुनंदन और कुल्लूक भट्ट के टोलों में प्रवेश कर पुनः न्याय और सांख्य की व्याख्या में लीन होना चाहिए, या फिर बीसवीं शताब्दी के ज्ञान-विज्ञान और मेधा की ज्योति की ओर अग्रसर होना चाहिए? क्या हम महासागर के तट पर खड़े होकर केवल लहरों की उथल-पुथल को देखकर निराश होकर लौट जाएँगे? क्या हम छोटे जलाशय में कैद रहकर सोचेंगे कि हम सुखी हैं? अथवा हताशा के दंश को शांत करने के लिए यह कल्पना करेंगे कि आधुनिक शिक्षा एवं संस्कृति मिथ्या हैं, वे मानव-हृदय में केवल जलन और तृष्णा उत्पन्न करती हैं तथा सुख, शांति और आध्यात्मिक चिंतन के मार्ग को कंटकाकीर्ण बनाती हैं?
किसी जाति के गौरव और महत्ता का आकलन करने के लिए यह देखना आवश्यक होता है कि वह किस आधार पर निर्मित हुआ है। मेरा मानना है कि भूदेव और बंकिमचंद्र के विचारों पर आधारित होकर जो लोग बंगाली, अथवा संपूर्ण हिंदू जाति के गौरव का बखान करते हैं, वे अनजाने में ही भ्रांत धारणाओं को पोषित कर रहे हैं। यदि रघुनंदन और कुल्लूक भट्ट की टीकाओं को ही गौरव का विषय मानकर उनके आदेशों को अपरिवर्तनीय सत्य मान लिया जाए, और आधुनिक जागरण एवं नवोदित प्रेरणाओं को तिलांजलि देकर प्राचीनता की जड़ता को स्थिर और स्थायी समझा जाए, तो यह मृतप्राय जाति आधुनिकता की तीव्र चुनौती के सामने और कितने दिनों तक टिक सकेगी?
स्वतंत्र चिंतन किसी जाति के जीवन-धारा का स्रोत होता है। जिस दिन से यह स्रोत सूखना आरंभ करता है, उसी दिन से मौलिकता और जिज्ञासा लुप्त होने लगती है, और वही दिन किसी जाति के पतन का प्रारंभ बिंदु बन जाता है। आज सहस्र वर्षों से यह स्वतंत्र चिंतन आलस्य एवं अंधविश्वास की गहरी कीचड़ में फँसकर राष्ट्रीय जीवन-प्रवाह को अवरुद्ध कर चुका है। जब स्वतंत्र चिंतन और विवेकशक्ति क्षीण हो जाती है, और जब व्यक्ति अपने विचारों को व्यक्त करने का साहस खो देता है, तब उसमें पराश्रयता की वृत्ति बढ़ने लगती है। फलस्वरूप, ऐसा जीवन साधारण पशु-जीवन से किंचित ही भिन्न रहता है।
इतिहास प्रमाणित करता है कि संपूर्ण भारतीय समाज एक निष्क्रिय, जड़ एवं शिथिल स्थिति में जा चुका है। जब कोई समाज इस प्रकार की निम्नावस्था को प्राप्त करता है, तब उसमें पुरातन के प्रति एक अनावश्यक एवं अतिरेक श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है, और वह आत्मशक्ति में विश्वास खो बैठता है। इस चंचल परिवर्तनशील विश्व में समय के साथ सामाजिक व्यवस्थाएँ भी परिवर्तित होती रहती हैं। भौतिक संसार में जैसे युगांतर होते हैं, वैसे ही मनोवैज्ञानिक क्रांतियाँ भी स्वाभाविक होती हैं। किंतु अंधविश्वास से संचालित समाज इसे स्वीकार नहीं कर पाता। एक अज्ञात मोहिनी शक्ति उसके हृदय को जकड़ लेती है, जिसे सत्य और तर्क की कितनी भी चोटें तोड़ नहीं पातीं।
जब किसी समाज में अंधकार व्याप्त होता है, तब शास्त्रों को ‘अभ्रांत’ मान लिया जाता है— और मार्गदर्शन के प्रकाश के अभाव में ऋषियों के वचनों को ही अंतिम सत्य समझा जाता है। यही हमारे साथ भी हुआ। जन्म से लेकर मृत्यु तक हिंदू समाज स्वयं को इतनी दृढ़ बेड़ियों में बाँध चुका है कि जीवन के समस्त कर्तव्यों और अकर्तव्यों को, बिना किसी स्वतंत्र विवेक के, शास्त्रों के आदेशानुसार ही संपन्न करना अपना परम धर्म समझने लगा है। परंतु यह विचार करना कि ‘क्यों करें?’— यह प्रश्न तक उसके मन में उदित नहीं होता।
इस निराशाजनक अवस्था में दो वर्गों का प्रभुत्व स्थापित हो गया— एक शास्त्रकार और दूसरा शास्त्र-व्याख्याता। स्वतंत्र चिंतन के तिरोभाव के साथ मौलिकता समाप्त हो गई, बुद्धि केवल शास्त्र-वचनों की व्याख्या के संकुचित दायरे में सिमट गई, और यहीं से टीका-टिप्पणियों का आरंभ हुआ।
परंतु भारतीय गौरव के वास्तविक स्वरूप को भी देखना चाहिए। भारत सदा से ही शास्त्रों के बंधन में जकड़ा हुआ और अंधविश्वासग्रस्त नहीं था। प्राचीन भारत में जिज्ञासा-प्रवृत्ति प्रबल थी और स्वतंत्र चिंतन निर्बाध प्रवाहित होता था। महर्षि कपिल तक ने ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वे तर्क और प्रमाण के बिना किसी सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते थे। चार्वाक ऋषि ने तो वेदों को भी अस्वीकार कर दिया और कहा कि ये कुछ धूर्त पुरुषों द्वारा रचित ग्रंथ हैं, जिन्होंने अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु लोगों को भ्रमित किया।
इस प्रकार, भारतीय इतिहास यह सिद्ध करता है कि जब-जब स्वतंत्र चिंतन एवं आत्मशक्ति का ह्रास हुआ, तब-तब हमारा समाज पतन की ओर अग्रसर हुआ। अतः यदि हमें अपने राष्ट्रीय जीवन को पुनः जागृत करना है, तो हमें नवीन ज्ञान, विज्ञान एवं स्वतंत्र चिंतन की ओर अग्रसर होना होगा, न कि प्राचीन रूढ़ियों में जकड़कर निष्क्रियता को अपनाना होगा।
वास्तव में सुश्रुत में बौद्ध मत के पर्याप्त प्रमाण प्राप्त होते हैं। इसमें शव-व्यवच्छेदन (शरीर विच्छेदन) के सुंदर नियमों का उल्लेख है और बिना प्रत्यक्ष प्रमाण के किसी भी विषय को स्वीकार न करने का उपदेश दिया गया है। अष्टांग-हृदय के रचयिता वाग्भट भी बौद्ध थे; यह जानते हुए कि हिंदू उनके मत को अस्वीकार कर सकते हैं, उन्होंने एक स्थान पर श्लेष या व्यंग्य के रूप में कहा—
“यदि कोई ग्रंथ मात्र इसलिए श्रद्धेय हो जाता है कि वह किसी ऋषि द्वारा प्रणीत है, तो केवल चरक और सुश्रुत का अध्ययन ही क्यों किया जाता है? क्यों वेल आदि आयुर्वेदीय तंत्रों को अस्वीकार कर दिया गया है? अतः केवल ग्रंथ के कथनों पर ध्यान केंद्रित कर उसकी सार्थकता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।”
अगले अंश में वे पुनः कहते हैं—
“जब औषधि का गुण ही मुख्य विषय है, तो फिर चाहे स्वयं ब्रह्मा उसका प्रयोग करें या कोई अन्य, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।”
महात्मा नागार्जुन द्वारा इस देश में रसायन शास्त्र की जो अद्भुत उन्नति हुई, उसमें संदेह नहीं। चक्रपाणि कहते हैं कि उन्होंने जो लौह-रसायन पद्धति अपनाई, वह प्रथम बार नागार्जुन द्वारा ही प्रतिपादित की गई थी। रसेन्द्र-चिंतामणि के रचयिता के अनुसार नागार्जुन ही रासायनिक तिर्यक्पतन प्रक्रिया के आविष्कर्ता थे।
प्राचीन भारत में केवल दर्शन और साहित्य ही अपनी चरम सीमा तक विकसित नहीं हुए थे, अपितु आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित तथा रसायन शास्त्र की भी विशद चर्चा होती थी। अब प्रश्न उठता है कि ये समस्त विद्या किस प्रकार विलुप्त हो गईं? कुछ लोग कहते हैं कि मुसलमानों के शासनकाल में हिंदू राजाओं की आर्थिक व राजनीतिक दुर्दशा ही इसका मुख्य कारण बनी। किंतु समसामयिक इतिहास के अध्ययन से यह तर्क दुर्बल प्रतीत होता है। आर्यावर्त पर मुस्लिम आक्रमण के बहुत पहले ही हिंदुओं में वैज्ञानिक अन्वेषण की प्रवृत्ति क्षीण होने लगी थी। यदि मुस्लिम अधिपत्य ही इसका कारण होता, तो दक्षिण भारत में इन शास्त्रों की परंपरा अक्षुण्ण रहनी चाहिए थी, क्योंकि वहाँ मुस्लिम सत्ता कभी स्थायी रूप से स्थापित नहीं हो पाई थी।
मुस्लिम शासनकाल में भी बंगाल में, विशेषकर नवद्वीप और विक्रमपुर में, हिंदू शास्त्रों का व्यापक अध्ययन-मनन चलता रहा। ये दोनों स्थान नवाबों की राजधानी के समीप थे। यदि व्यापक रूप से देखें, तो उपनिषदों की रचना-काल से लेकर बौद्ध धर्म की परिपक्व अवस्था तक के कालखंड में हिंदू मानसिकता की समस्त बौद्धिक उपलब्धियाँ संकलित हो चुकी थीं। पुरातत्वविदों ने इस कालखंड—ईसा से लगभग 600 वर्ष पूर्व से 700 ईस्वी तक—को भारत में ज्ञान-विज्ञान और स्वतंत्र विचारधारा के उत्कर्ष का युग कहा है। इसी काल में पाणिनि ने साहित्य-जगत में अतुलनीय व्याकरण की रचना की।
विलक्षण मेधा-शक्ति से युक्त तेजस्वी ऋषियों ने षड्दर्शन की रचना की और बुद्धदेव ने “अहिंसा परमो धर्मः” का ध्वज उठाकर समता, मैत्री और सर्वभूतों के प्रति भ्रातृत्व की उद्घोषणा करते हुए मानव हृदय में उच्च आकांक्षाओं का आलोक स्थापित किया। इसी काल में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और वराहमिहिर जैसे गणितज्ञों एवं ज्योतिषविदों ने अपने ग्रंथों के माध्यम से इन विद्याओं का चमत्कारी उत्थान किया। किंतु हाय! समय सदैव एकसा नहीं रहता। उन्नति और पतन चक्र की भांति परिवर्तनशील हैं। बौद्ध धर्म ने जिस उच्च नैतिक आदर्श की स्थापना की थी, वही उसके पतन का एक कारण बन गया। बौद्ध धर्म के अवसान के साथ ही हिंदू धर्म या ब्राह्मणवादी परंपरा का पुनः अभ्युदय हुआ। इस काल में ब्राह्मणों को हिंदू समाज पर वर्चस्व स्थापित करने का पूर्ण अवसर प्राप्त हुआ। किंतु ये ब्राह्मण वे नहीं थे, जिन्होंने उपनिषदों और षड्दर्शन की रचना की थी; अपितु यह एक ऐसी स्वार्थी और अयोग्य वर्ग का उदय था, जिसने महापुरुषों के पवित्र नाम का सहारा लेकर समाज का नेतृत्व हथिया लिया और अपने ही जातीय गौरव को धूमिल करते हुए केवल यज्ञोपवीत की महिमा के नाम पर समाज को शास्त्रों एवं पुराणों के जटिल जाल में जकड़ दिया। इस काल में रचित ग्रंथों का मुख्य उद्देश्य केवल ब्राह्मण जाति का महिमामंडन और उनके स्वार्थपूर्ण आधिपत्य को स्थायित्व प्रदान करना था।
वास्तव में, ब्राह्मणवादी प्रभुत्व अंधविश्वासों का एक विशाल अध्याय बन चुका था। वैज्ञानिक अन्वेषण की प्रवृत्ति लगभग समाप्तप्राय हो गई। चिकित्सा, प्राकृतिक विज्ञान तथा अन्य विषयों में जो अनुसंधान प्रारंभ हुए थे, वे शीघ्र ही लुप्त हो गए। इस विनाश का मुख्य कारण शास्त्रकारों के कठोर विधान थे। उदाहरणस्वरूप, मनु ने यह व्यवस्था दी कि मृत शरीर को छूने से अशौच हो जाता है, जिससे शरीर-व्यवच्छेदन विज्ञान विलुप्त हो गया। केवल इतना ही नहीं, समुद्र यात्रा तक को धर्मविरुद्ध घोषित कर दिया गया। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत से ज्ञात होता है कि जब उन्होंने ताम्रलिप्त (तमलुक) से सिंहल (श्रीलंका) की यात्रा की, तब कई ब्राह्मण व्यापारी उनके सहयात्री थे। इतना ही नहीं, एक समय ऐसा भी था जब हिंदुओं के समुद्री जहाज वृहद जलराशि पार कर बाली और जावा में उपनिवेश स्थापित कर चुके थे।
आज भारतीय कारीगरी और व्यापार विलुप्त हो चुके हैं। परंतु बौद्ध साहित्य से ज्ञात होता है कि कभी भारत से “बरौच” (Broach) से “अलेक्ज़ांड्रिया” (Alexandria) तक व्यापारिक वस्तुओं का निर्यात होता था। व्यापार के माध्यम से उपनिषदों की विचारधारा नव-नवगठित प्लेटोनिक दर्शन के अनुयायियों तक पहुँच गई। वाणिज्यिक संबंधों से सांस्कृतिक और बौद्धिक विचारों का आदान-प्रदान संभव होता है। किंतु जब हमारे शास्त्रकारों ने विदेश-यात्रा और समुद्र-यात्रा पर निषेध लगा दिया, तब भारत की भावी उन्नति का मार्ग अवरुद्ध हो गया। निःसंदेह, परंपरा की रक्षा का कुछ लाभ अवश्य होता है, किंतु जब रूढ़िवादिता की सीमा पार हो जाती है, तो वह हास्यास्पद बन जाती है।
स्वामी विवेकानंद ने ठीक ही कहा था—
“जो धर्म गरीबों के दुःख को नहीं देखता, जो मनुष्य को देवता नहीं बनाता, वह धर्म ही नहीं है! हमारा धर्म क्या है? ‘छूत मत करो, छू मत जाओ’ यही तो हमारी एकमात्र चिंता है।”
जब समाज इस प्रकार पतित हो जाता है, तब उसमें अनेक अनर्थकारी परंपराएँ प्रवेश कर जाती हैं। ब्राह्मणवादी प्रभुत्व से पीड़ित बंगाल में शीघ्र ही “कौलीन्य” प्रथा जैसी कुरीतियाँ विकसित हुईं, जिसके कारण समाज का पतन और अधिक गहरा हो गया। इस सामाजिक विघटन और रूढ़िवादिता ने भारतीय चेतना को संकुचित कर दिया और उसे पुनः उन्नति के पथ पर अग्रसर होने से रोक दिया।
ब्रिटिश शासन के प्रारंभ में बंगालियों के लिए एक अवसर उपस्थित हुआ। जब अल्पसंख्यक ब्रिटिश व्यापारियों ने अपनी बुद्धि एवं कौशल से एक विशाल साम्राज्य की नींव रखी, तब इस साम्राज्य के शासन और राजस्व संग्रह हेतु देशी कर्मचारियों की आवश्यकता हुई। चतुर अंग्रेज समझ गए कि राज्य स्थापना के मूल में शासित जनता की सहानुभूति प्राप्त करना आवश्यक है। परिणामस्वरूप, बंगाली कर्मचारी बड़ी संख्या में दीवानी मामलों से संबंधित समस्त कार्यों में नियुक्त होने लगे। परंतु बंगालियों ने इस अवसर का दुरुपयोग किया। कुछ स्वार्थांध कर्मचारियों ने इस अवसर का लाभ उठाकर अपार धन अर्जित किया, और अपनी धनलिप्सा की पूर्ति हेतु नीच प्रवृत्तियों का आश्रय लिया। किंतु न तो वे प्रशासनिक विभाग में, न ही व्यापारिक विभाग में, किसी भी प्रकार की वास्तविक शिक्षा प्राप्त कर सके।
हमारे सर्वनाश की शुरुआत तभी से हो गई। औद्योगिक क्रांति ने संपूर्ण पश्चिमी जगत को प्रभावित किया। भाप शक्ति के उपयोग से जब मिलों का संचालन प्रारंभ हुआ, तब श्रमजीवियों की आर्थिक स्थिति में भयंकर परिवर्तन आया। इंग्लैंड में आए इस परिवर्तन के साथ ही भारतीय उद्योग भी प्रभावित हुआ। पहले, ढाका, शांतिपुर, फुलिया आदि स्थानों के महीन सूती वस्त्र करोड़ों रुपयों में ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंटों द्वारा इंग्लैंड भेजे जाते थे, जिससे कुछ मात्रा में अंग्रेजों का धन भारत लौटता था। किंतु भाप शक्ति के आविष्कार ने इस मार्ग को अवरुद्ध कर दिया—श्रमजीवियों के जीवन में एक नया अध्याय आरंभ हुआ। इस परिवर्तन के कारण कई लघु व्यवसायियों और श्रमिकों का पूर्णतः विनाश हुआ, इसमें कोई संदेह नहीं। ‘देशी जुलाहे’ और ‘देशी बुनकर’ अन्नाभाव के कारण अपने पारंपरिक व्यवसाय को त्यागने के लिए विवश हुए। परंतु इसे केवल प्राकृतिक नियम मानकर संतोष कर लेना भी अनुचित होगा, क्योंकि शक्तिशाली का विजय और दुर्बल का पराजय तो सदा अवश्यंभावी होता है।
इस प्रकार देशी उद्योग के कोमल मूल पर तीव्र प्रहार हुआ। भारतीय कुटीर उद्योग समाप्त होने लगे। विदेशी उद्योग भारत के अभावों की पूर्ति के लिए तत्पर हो गए, और करोड़ों रुपयों की संपत्ति देश से बाहर जाकर विदेशी समृद्धि को बढ़ाने में व्यय होने लगी। देखते ही देखते इंग्लैंड से सैकड़ों व्यापारी कलकत्ता, बंबई, मद्रास आदि प्रमुख नगरों में व्यापारिक केंद्र स्थापित करने लगे, और दूसरी ओर भारत से कच्चे माल—कपास, जूट, अनाज आदि—को इंग्लैंड भेजा जाने लगा। हमारी दुर्बुद्धि देखिए कि हम अपनी ही कपास को अंग्रेजों से बुनवाकर सौ गुना मूल्य देकर खरीदने लगे। मैनचेस्टर के विदेशी व्यापारियों ने अपनी लक्ष्मी को संचित किया, और हम भिखारी बनकर सड़कों पर उतरने के लिए बाध्य हो गए।
इसी समय, बंगाली क्लर्क वर्ग की उत्पत्ति अंग्रेज व्यापारियों के संरक्षण में हुई। अंग्रेज व्यापारी बंगालियों की सहायता के बिना अपना व्यवसाय नहीं चला सकते थे; खरीद-बिक्री और लेन-देन के अधिकांश कार्य बंगाली क्लर्कों के हाथों से ही संपन्न होते थे। कई अनपढ़ व्यापारिक एजेंट इस अवसर का लाभ उठाकर करोड़पति बन गए। किंतु जब अशिक्षित व्यक्ति के हाथों में अपार धन आ जाता है, तब वही होता है जो हुआ। इंद्रियों के तीव्र प्रलोभन और ऐश्वर्य की चकाचौंध में विलासिता की ज्वाला प्रचंड रूप से भड़क उठी—बंगाली, कार्यक्षम होने के बावजूद, स्वतंत्र व्यापार द्वारा स्वतंत्र जीवनयापन में असमर्थ रहे। इसी बीच गुजरात, राजपूताना (बीकानेर) और उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के व्यापारी समूहों में आकर समस्त व्यवसायों पर अधिकार करने लगे, और बंगाली क्लर्क बनने की लालसा में अंग्रेजी सीखने लगे। इस प्रकार उच्च शिक्षा के अहंकार में जलते-जलते भी 20-25 रुपये की क्लर्की को ही बंगाली युवकों का परम लक्ष्य मान लिया गया।
इस प्रकार, इंग्लैंड की लक्ष्मी का अनुसरण करते हुए बंगाली क्लर्क पंजाब से लेकर बर्मा तक फैल गए। ‘चाकरी कैसे मिलेगी?’—यही मस्तिष्क की पूरी प्रखरता का उपयोग होने लगा। वस्तुतः पेट की तीव्र चिंता ने बंगालियों की मनुष्यता तक छीन ली। सरलता और साहस जैसी सहज प्रवृत्तियाँ उनके हृदय से लुप्त हो गईं। अब उनकी प्रखर बुद्धि केवल घृणास्पद चाटुकारिता और कपटपूर्ण व्यवहार में ही दिखाई देने लगी।
यह भी सुनने में आया कि किसी अंग्रेज न्यायाधीश की नवविवाहिता पत्नी का देहांत हो गया। शोक संतप्त न्यायाधीश प्रतिदिन अपनी पत्नी की कब्र पर जाकर अश्रु बहाते थे। यह देखकर एक चतुर बंगाली कर्मचारी समझ गया कि यह उपयुक्त अवसर है। अगले ही दिन वह न्यायाधीश से पहले कब्र के पास पहुँचकर आर्तनाद करने लगा—‘माँ चली गईं! अब मुझे कौन पालेगा!’ परिणामस्वरूप, शीघ्र ही उसकी ‘सहानुभूति’ का उचित पुरस्कार निर्धारित कर दिया गया। वास्तव में, जिनका आजीविका का आधार नौकरी बन गया है, उनमें आत्मसम्मान का अभाव होना स्वाभाविक है। तब गुलामी को गौरव का विषय माना जाने लगा।
आज भारत का संपूर्ण आयात-निर्यात लगभग 344 करोड़ रुपये का है। किंतु इस वाणिज्यिक प्रवाह का कोई छोटा अंश भी क्या बंगाली व्यापारियों के हाथों से होकर गुजरता है? हम पश्चिमी प्रांतों के व्यापारिक कुशलता और तत्परता से ईर्ष्या करते हुए उन्हें ‘अशिक्षित व्यापारी’ या ‘छोटे दुकानदार’ कहकर अपमानित करते हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि आज बंगाल में इन्हीं व्यापारियों का वर्चस्व है—हमें उन्हीं से सीखना होगा। व्यापार और उद्योग में वही व्यक्ति सफल होते हैं जो इसे गंभीरता से सीखते और अपनाते हैं। यह कोई ऐसा विषय नहीं जिसे केवल पढ़कर या समझकर पूरी तरह आत्मसात किया जा सके—इसे स्वयं करके ही सच्चा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
देश में आज एक चर्चा जोरों पर है कि नौकरी छोड़कर व्यापार करना चाहिए। कई युवक कहते हैं, ‘यदि अच्छी नौकरी नहीं मिली, तो दुकान खोल लूँगा।’ यह निःसंदेह एक उत्तम विचार है, किंतु पश्चिमी देशों की प्रणाली अधिक व्यावहारिक है। वहाँ व्यापार में रुचि रखने वाले युवक पहले किसी उद्योग या दुकान में प्रशिक्षु (apprentice) बनकर अनुभव प्राप्त करते हैं। तत्पश्चात, वे अपनी पूंजी से या साझेदारी में व्यवसाय आरंभ करते हैं। इससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है। किंतु हमारे यहाँ युवा बिना किसी अनुभव के, केवल पैसा लेकर व्यापार में उतरते हैं और फिर असफल होकर पीछे हट जाते हैं।
यदि इस व्यावसायिक दरिद्रता पर विचार करें, तो यह अत्यंत पीड़ादायक प्रतीत होता है। बंगाल में 82 जूट मिलें हैं, किंतु इनमें से एक भी बंगाली के स्वामित्व में नहीं है। बंगाली ‘स्वदेशी’ अवश्य बने, किंतु व्यवसायिक नेतृत्व की दिशा में आगे नहीं बढ़ सके। यदि हम अब भी अपनी उदासीनता को त्यागकर कर्मठता और व्यावसायिकता को नहीं अपनाएँगे, तो हमारा आर्थिक पराभव अपरिहार्य होगा।
निश्चित रूप से, इस प्रकार की घटनाओं के लिए छात्र दोषी नहीं हैं—इसके लिए उत्तरदायी है वही त्रुटिपूर्ण शिक्षापद्धति, जिसके माध्यम से हमारे देश में शिक्षा प्रदान की जाती रही है। जिन विषयों में बालक स्वाभाविक रूप से रुचि रखते हैं—जैसे उनके अपने शरीर की बातें, उनके अपने गाँव की स्थिति आदि—उन्हें उन विषयों की शिक्षा नहीं दी जाती। इसके विपरीत, वे ऐसे विषय पढ़ने के लिए बाध्य किए जाते हैं जिनका उनके जीवन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता—जैसे दूरस्थ देशों का भूगोल एवं इतिहास।
जो साहित्य के शिक्षक होते हैं, वे शब्दों के पर्यायवाची, व्याकरण की जटिलताएँ तथा आलंकारिक अभिव्यक्तियों (allusions) में इस प्रकार छात्रों को उलझा देते हैं कि वे साहित्य में रस होने की अनुभूति ही नहीं कर पाते। गणित पढ़ाने का दायित्व जिन शिक्षकों को सौंपा जाता है, वे ऐसा प्रतीत होते हैं मानो उनका मुख्य उद्देश्य गणित के प्रति छात्रों में भय उत्पन्न करना ही हो। अन्यथा, वे सामान्य छात्रों को अनावश्यक रूप से जटिल समस्याओं में क्यों उलझाते और उनके जीवन को दुष्कर बना देते? ऐसी शिक्षण-पद्धति का जो परिणाम होना चाहिए, वही होता है—छात्र जैसे ही परीक्षा रूपी समुद्र को पार कर लेते हैं, वैसे ही वे माता सरस्वती से विदा ले लेते हैं। वे कभी यह नहीं सीख पाते कि ज्ञानार्जन में कितना अनुपम आनंद है।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में निरर्थक एवं नीरस ज्ञान अर्जित करने के प्रयास में जहाँ बालकों के मस्तिष्क का दुरुपयोग होता है, वहीं युवावस्था एवं प्रौढ़ावस्था में लोग अपने अवकाश-समय को विद्यानुराग में व्यतीत करने के बजाय व्यर्थ की कहानियों एवं उपन्यासों के पठन में गँवा देते हैं। वे यह नहीं समझते कि एक निकृष्ट उपन्यास से जितना आनंद प्राप्त होता है, उससे कहीं अधिक आनंद इतिहास, जीवन-चरित अथवा यात्रा-वृत्तांत पढ़ने से मिलता है, और साथ ही, उनका ज्ञान भी बढ़ता है।
अब, कुछ और बातें कहकर मैं इस निबंध का समापन करूँगा। मुझे यह भान हो रहा है कि इस निबंध में, संभवतः भावावेश के कारण, मैंने कुछ कठोर बातें कह दी हैं। आशा है, पाठकगण यह विश्वास करेंगे कि ये बातें मैंने किसी दुर्भावना के वशीभूत होकर नहीं कही हैं, बल्कि यह हमारे समाज की भीषण दुर्दशा से उत्पन्न वेदना है, जिसने मुझे इस प्रकार लिखने के लिए बाध्य किया है।
मैं भारतवर्ष की प्राचीन गौरवमयी परंपरा को नहीं भूला हूँ, न ही मैं पूर्वजों की पवित्र स्मृति के प्रति किसी को अनादर भाव रखने के लिए कहता हूँ। किंतु जो लोग उन स्मृतियों के प्रति श्रद्धानत होकर उनके दोषों को भी महिमामंडित करना चाहते हैं और उन्हें पुनः अपनाना चाहते हैं, उन्हीं के लिए यह निबंध लिखा गया है।
जो लोग कुल्लूकभट्ट एवं रघुनंदन की अप्रतिम पांडित्य की प्रशंसा सुनकर प्राचीन पद्धति को पुनः प्रतिष्ठित करने के इच्छुक हैं और नवीन प्रणाली को पूर्णतः निष्कासित कर पुरानी को स्थापित करना चाहते हैं, उनसे मेरी सहमति नहीं हो सकती। नवीन भारत, नवीन एवं प्राचीन—दोनों के समन्वय से निर्मित होगा। अंधविश्वास कभी भी राष्ट्रीय प्रगति का आधार नहीं बन सकता।
प्राचीन हिंदू समाज की महान आदर्श-परंपराओं को भुलाना अनुचित होगा, किंतु हमें यह भी विचार करना होगा कि आधुनिक समय में उन आदर्शों का अनुसरण कितना संभव है। जातिभेद, स्मृतियाँ एवं सामाजिक व्यवस्थाओं के कारण भारत में एक शांत, निर्बाध, तथा प्रतिस्पर्धाहीन जीवनशैली विकसित हुई थी, जिससे सुंदर ग्रामीण सभ्यता का निर्माण हुआ, जिसकी प्रशंसा विदेशी इतिहासकारों ने की है। पश्चिमी दार्शनिक, जैसे टॉल्सटॉय एवं समाजवादी चिंतक, भी ऐसी सामाजिक संरचना का स्वप्न देखते हैं। इसी सामाजिक अनुशासन के कारण हिंदू समाज में अपराधों की संख्या अन्य समाजों की तुलना में कम रही है। किंतु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस समाज-व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। जब तक मनुष्यों में स्वार्थलिप्सा एवं प्रभुत्व की आकांक्षा बनी रहेगी, जब तक एक जाति दूसरी जाति को अपने स्वार्थ हेतु पराधीन बनाए रखने का प्रयास करेगी, तब तक जो समाज समाजवाद (socialism) के आदर्श पर आधारित होगा, वह शीघ्र ही अन्य के अधीन हो जाएगा। भारत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
एमर्सन ने कहा है—”विश्वविद्यालय प्रायः प्रतिभा के विरोधी होते हैं, क्योंकि प्रतिभा अपनी राह स्वयं बनाती है और रूढ़िगत पद्धतियों का निरादर करती है।” यह बात जितनी आधुनिक विश्वविद्यालयों पर लागू होती है, उससे कहीं अधिक भारतीय परंपरागत शिक्षण-प्रणालियों एवं टोलों पर लागू होती है। इस शिक्षापद्धति ने राष्ट्रीय प्रतिभा का जितना दमन किया है, उसे नकारा नहीं जा सकता। आज भी कट्टरपंथी लोग गर्व से कहते हैं—”हमारे हिंदू धर्म की अद्भुत महिमा यह है कि जन्म से मृत्यु तक प्रत्येक कार्य का निर्धारण शास्त्रों द्वारा किया गया है।” इस प्रकार की अनगिनत विधि-नियमों की जकड़न ने समाज को जड़ बना दिया।
हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि एक समय भारत की प्रगति स्वतंत्र चिंतन और स्वाधीन आचरण के कारण हुई थी। यदि भारत का पुनरुत्थान होना है, तो वह भी इन्हीं आधारों पर होगा। मानसिक दासता एवं शारीरिक दासता, दोनों ही राष्ट्रीय उन्नति में समान रूप से बाधक हैं। जो लोग भारत में अंग्रेज़ी मानसिकता की दासता लाना चाहते हैं, और जो लोग संस्कृत परंपराओं की दासता स्थापित करना चाहते हैं—दोनों समान रूप से भ्रमित हैं। हमें हर विचार को केवल इसलिए नहीं मान लेना चाहिए कि वह हर्बर्ट स्पेंसर या शंकराचार्य ने कहा है। केवल वही विचार स्वीकार्य होना चाहिए, जिसकी सत्यता तर्क एवं विवेक से प्रमाणित हो। यही स्वतंत्र चिंतन का मूल है।
भारत में पुनः स्वतंत्र विचार एवं स्वाधीन आचरण का संचार हो। स्वतंत्रता कभी-कभी गंदे दलदल का कीचड़ भी उछाल सकती है, किंतु यही स्वतंत्रता मन्दाकिनी के पवित्र जल का स्रोत भी बन सकती है।
इस विस्तृत निबंध में मैंने कुछ महत्वपूर्ण बातों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है, किंतु मैं नहीं कह सकता कि मैं इसमें कितना सफल रहा हूँ। बुद्धि की प्रखरता में बंगाली जाति विश्व की किसी भी जाति से हीन नहीं है। दुर्भाग्यवश, इस शक्ति का सदुपयोग नहीं हो पाया। इसी कारण, विश्व के समक्ष बंगाली जाति की उपलब्धियों के रूप में प्रदर्शित करने के लिए बहुत कम उदाहरण हैं। मुस्लिम शासनकाल में यह तर्कशक्ति न्याय के निष्फल वाद-विवाद एवं स्मृतियों की जटिल और हास्यास्पद व्यवस्थाओं में व्यर्थ कर दी गई, सत्य की खोज में नहीं।
आज भी लोग कहते हैं— “हमारे हिंदू धर्म की क्या अपूर्व महिमा है! प्रातःकाल से संध्या तक, जन्म से मृत्यु तक प्रत्येक कार्य शास्त्रों द्वारा निर्धारित कर दिया गया है।” किंतु इन असंख्य नियमों की जकड़बंदी का परिणाम वही हुआ, जो होना था। इस शिक्षापद्धति ने भारत में मध्यम-शक्ति संपन्न व्यक्ति उत्पन्न करने की सुविधा तो दी, परंतु महाशक्तिशाली व्यक्तियों के जन्म के लिए वह सहायक नहीं रही। किंतु किसी राष्ट्र की उन्नति के लिए महान प्रतिभाशाली पुरुषों का जन्म अनिवार्य है—”अकेला सिंह भी सहस्त्र मृगों का संहार करने में समर्थ नहीं होता।”
इसीलिए जब फ्रांसीसी समाज विलासिता एवं राजकीय अत्याचार की दलदल में डूब रहा था, तब रूसो की साहित्यिक प्रतिभा ने उसमें नवीन विचारों का संचार कर फ्रांसीसी क्रांति की आधारशिला रखी। जब क्रांतिकारी सेना राजसमर्थकों के हाथों पराजित हो रही थी, तब इंजीनियर कार्नो ने नवीन सैन्य व्यूह-रचना विकसित कर शत्रु की गति को बाधित किया।
किन्तु पूर्व में ही मैंने कहा कि प्रतिभा संकुचित नियमों में बंधकर विकसित नहीं हो सकती। स्वतंत्र चिंतन के अभाव में यह जन्म ही नहीं ले सकती। अतः भारत में पुनः स्वतंत्र चिंतन एवं स्वतंत्र आचार की पुनः स्थापना हो।
यह लेख 1909 में लिखा गया था।
Translated by Tanmoy Bhattacharyya
