राम मोहन राय और सतिप्रथा का षड्यंत्र
वेदों और शास्त्रों में सतिप्रथा का कोई उल्लेख नहीं
सनातन धर्म की मूल शिक्षाओं और वेदों में सतिप्रथा (widow burning) का कोई उल्लेख नहीं मिलता। विशेष रूप से, अथर्ववेद में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एक विधवा को अपने पति की चिता में जलने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। वैदिक काल और उसके बाद भी, विधवाओं को समाज में सम्मानजनक जीवन जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी।
रामायण में ही हम देखते हैं कि राजा दशरथ की मृत्यु के बाद उनकी तीनों पत्नियाँ—कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी—सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करती रहीं। यहाँ तक कि कैकेयी, जो राम के वनवास के लिए ज़िम्मेदार थीं, उन्हें भी सम्राट राम ने सम्मान दिया।
इसी प्रकार, महाभारत में सत्यवती का उल्लेख मिलता है, जो कुरु वंश की महत्त्वपूर्ण स्त्री थीं। उनके पति, राजा शांतनु के निधन के बाद भी, वे राजनीति में सक्रिय रहीं और उनके विचारों को सम्मान दिया गया। मनुस्मृति (Manu Smriti)सहित किसी भी शास्त्र में सतिप्रथा का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। वेदों के गृह्यसूत्र भी इस प्रथा का समर्थन नहीं करते।
ईसाई मिशनरियों की साजिश और राम मोहन राय की भूमिका
18वीं-19वीं शताब्दी में भारत में ब्रिटिश शासन स्थापित हो चुका था। अंग्रेज़ों को यह भलीभांति ज्ञात था कि भारत को केवल राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से भी तोड़ना आवश्यक है। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले शिक्षा प्रणाली को अपने नियंत्रण में लिया। जबकि वैदिक शिक्षा प्रणाली में ज्ञान का उद्देश्य धर्म और संस्कृति की रक्षा था, ईसाईयों के लिए शिक्षा मात्र एक व्यापार और धर्म-प्रचार का साधन थी।
इसी रणनीति के तहत, उन्होंने राम मोहन राय (1772-1833) को एक ‘भारतीय सुधारक’ के रूप में प्रस्तुत किया। राम मोहन राय को ब्रिटिश हुकूमत ने एक जागीरदार (ज़मींदार) का दर्जा दिया और उन्हें एक प्रतिक्रियावादी संस्था ब्रह्म समाज (Brahma Samaj) बनाने के लिए प्रेरित किया। यह संस्था मूलतः सनातन धर्म के विरुद्ध प्रचार करने का एक केंद्र थी।
सबसे बड़ा षड्यंत्र सतिप्रथा को लेकर रचा गया। बंगाल के एक सीमित क्षेत्र—कोलकाता और श्रीरामपुर—में अचानक सतिप्रथा की घटनाएँ ‘पाई’ जाने लगीं। राम मोहन राय और उनके ईसाई मित्र विलियम केरी ने इस प्रथा के अस्तित्व को लेकर झूठे दावे किए। जबकि बंगाल के किसी भी ब्राह्मण, कायस्थ, या सद्गोप परिवार में इस प्रकार की कोई प्रथा प्रचलित नहीं थी।
सतिप्रथा का झूठा प्रचार और ब्रिटिश कानून
विलियम बेंटिक को ‘सुधारक’ के रूप में स्थापित करने के लिए अंग्रेज़ों ने सतिप्रथा के उन्मूलन का झूठा कानून पारित किया । यह कानून पूरी तरह से एक जाली रिपोर्ट के आधार पर बनाया गया था। वास्तविकता यह थी कि बंगाल और भारत के अन्य भागों—महाराष्ट्र, राजस्थान, असम और दक्षिण भारत—में कहीं भी सतिप्रथा का कोई प्रमाण नहीं था।
इतिहास बताता है कि जब इस झूठ का विरोध बढ़ने लगा, तो राम मोहन राय इंग्लैंड भाग गए और वहीं उनकी मृत्यु हो गई।
ईसाई धर्मांतरण का एक उपकरण था सतिप्रथा का झूठ
ईसाई मिशनरियों ने भारत में सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए सतिप्रथा का झूठा प्रचार किया। वे यह नहीं समझ पाए कि भारत की धार्मिक और दार्शनिक परंपरा किसी एक पुस्तक तक सीमित नहीं है, जैसा कि ईसाई धर्म केवल न्यू टेस्टामेंट (सुसमाचार) तक सीमित है। ब्राह्मण विद्वान अनेक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं, जिससे उनकी वैचारिक शक्ति कभी दुर्बल नहीं होती।
ईसाई मिशनरियों ने सनातन धर्म को कमजोर करने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाए, लेकिन सत्य को छुपाया नहीं जा सकता। सतिप्रथा एक योजनाबद्ध झूठ था, जिसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति को अपमानित करना था। आज, राम मोहन राय और उनका ब्रह्म समाज इतिहास के पन्नों में खो चुके हैं, लेकिन सनातन धर्म अपनी अखंड परंपरा के साथ यथावत खड़ा है।
ग्रंथ सूची (Bibliography)
- अथर्ववेद – महर्षि वेदव्यास (अनुमानित रचना काल: 5500-5000 ईसा पूर्व)
- रामायण – महर्षि वाल्मीकि (अनुमानित रचना काल: 1500 ईसा पूर्व)
- महाभारत – महर्षि वेदव्यास (अनुमानित रचना काल: 1000-500 ईसा पूर्व)
- मनुस्मृति – महर्षि मनु (अनुमानित रचना काल: 300 ईसा पूर्व – 200 ईस्वी)
- गृह्यसूत्र – वैदिक ऋषियों द्वारा रचित (अनुमानित रचना काल: 1500 ईसा पूर्व)
- चैतन्य चरितामृत – कृष्णदास कविराज गोस्वामी (प्रकाशन वर्ष: 16वीं शताब्दी)
- चैतन्य भागवत – वृंदावन दास ठाकुर (प्रकाशन वर्ष: 16वीं शताब्दी)
- चैतन्य मंगल – लोचन दास ठाकुर (प्रकाशन वर्ष: 16वीं शताब्दी)
- मंगल काव्य (मनसा मंगल, अन्नदा मंगल) – विभिन्न बंगाली कवियों द्वारा (प्रकाशन काल: 16वीं – 18वीं शताब्दी)
- ब्रह्म समाज और राम मोहन राय का इतिहास – डॉ. आर.सी. मजूमदार (प्रकाशन वर्ष: 1950)
- William Carey and the Missionary Mindset – Jeffrey Cox (प्रकाशन वर्ष: 2004)
- The British Missionary Enterprise in India, 1813-1914 – Andrew Porter (प्रकाशन वर्ष: 2000)
- Sati: Evangelicals, Baptist Missionaries, and the Changing Colonial Discourse – Lata Mani (प्रकाशन वर्ष: 1998)
- Western Foundations of the Caste System – Martin Fárek, Dunkin Jalki, Sufiya Pathan, et al. (प्रकाशन वर्ष: 2017)
