काश्मीर से दिल्ली और इलाहाबाद तक की अनूठी गाथा
मुगल काल में नेहरू परिवार की दिल्ली यात्रा
18वीं शताब्दी के प्रारंभ में, जब मुगल साम्राज्य का पतन हो रहा था और फर्रुखसियर दिल्ली के सिंहासन पर आसीन थे, उसी समय एक प्रतिष्ठित कश्मीरी ब्राह्मण विद्वान, राजकली का आगमन दिल्ली में हुआ। उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर बादशाह फर्रुखसियर ने उन्हें दिल्ली में बसने के लिए आमंत्रित किया और उन्हें एक विशाल जागीर प्रदान की, जो एक बड़ी खाई (परिखा) के पास स्थित थी।
संस्कृत और फ़ारसी में निष्णात राजकली ने परिखा के किनारे एक भव्य आवास का निर्माण कराया। उर्दू भाषा में परिखा को “नाहर” कहा जाता है। समय के साथ, “नाहर” शब्द उनके नाम से जुड़ गया, और मूल उपाधि विलुप्त होने लगी। इस प्रकार, “नाहर” से परिवर्तित होकर यह उपाधि “नेहरू” बन गई। यही भारत के प्रसिद्ध नेहरू परिवार का प्रारंभिक इतिहास है।
1857 का विद्रोह और नेहरू परिवार की आपदा
19वीं शताब्दी में, जब मुगल साम्राज्य अपने अंतिम चरण में था, भारतभर में अराजकता फैल रही थी। एक ओर मराठों के आक्रमण हो रहे थे, तो दूसरी ओर ब्रिटिश साम्राज्य भारत में अपने पांव जमा रहा था। इसी दौरान, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में नेहरू परिवार को भारी क्षति उठानी पड़ी।
उस समय, गंगाधर नेहरू दिल्ली के नगर कोतवाल थे। जब 1857 का विद्रोह भड़का, तो नेहरू परिवार का सबकुछ नष्ट हो गया। विद्रोहियों और अंग्रेजों दोनों ने उनके घरों को जला दिया, जिससे सभी संपत्ति, दस्तावेज और पारिवारिक धरोहर नष्ट हो गई।
गंगाधर नेहरू के दो पुत्रों और एक पुत्री को जान बचाने के लिए दिल्ली से पैदल भागना पड़ा। रास्ते में कई बार वे मृत्यु के निकट पहुंचे, लेकिन गंगाधर के एक पुत्र की अंग्रेजी भाषा ज्ञान ने उन्हें बचा लिया। एक मौके पर, अंग्रेज सैनिकों ने उनकी बहन को विदेशी बच्ची समझकर अपहरण करने का संदेह किया। सैनिकों ने जब उन्हें मारने का प्रयास किया, तब उनके भाई ने टूटी-फूटी अंग्रेजी में समझाकर अपनी जान बचाई।
आखिरकार, यह परिवार दिल्ली से पलायन कर आगरा पहुंचा, जहां गंगाधर नेहरू का देहांत हो गया। उनके निधन के तीन महीने बाद, 1861 में, उनके पुत्र पंडित मोतीलाल नेहरू का जन्म हुआ।
इलाहाबाद में नेहरू परिवार की पुनः स्थापना
मोतीलाल नेहरू के बड़े भाई नंदलाल नेहरू ने विधि की पढ़ाई की और इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक प्रतिष्ठित वकील बन गए। उनका अनुसरण करते हुए मोतीलाल नेहरू ने भी कानून की शिक्षा ग्रहण की और भारत के सबसे प्रसिद्ध वकीलों में से एक बने।
- नेहरू परिवार की समृद्धि बढ़ी, और मोतीलाल नेहरू ब्रिटिश और यूरोपीय रहन-सहन को अपनाने लगे।
- इलाहाबाद में उनका घर ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय राजाओं के प्रमुख केंद्रों में बदल गया।
- मोतीलाल नेहरू की विलासिता और धन-संपत्ति की कहानियां पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गईं।
भारत के भविष्य निर्माता: जवाहरलाल नेहरू का जन्म
मोतीलाल नेहरू के समृद्ध और प्रभावशाली वातावरण में, 14 नवंबर 1889 को एक ऐसा बालक जन्मा, जो आगे चलकर भारत की स्वतंत्रता संग्राम का अग्रणी नेता बना—पंडित जवाहरलाल नेहरू।
यहीं से नेहरू परिवार का राजनीतिक और राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवेश हुआ, जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्रोत नृपेन्द्रकृष्ण चटर्जी
जवाहर लाल
1948 (Kolkata)
